इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
सिडनी। एक नए अध्ययन के मुताबिक बिजली संयंत्रों, खनिज प्रसंस्करण संयंत्रों और नगर पालिकाओं से उत्सर्जित लाखों टन व्यर्थ पदार्थो के उपयोग से उर्वरता, स्वास्थ्य, धन और खूबसूरती को पैदा किया जा सकता है।
'कोऑपरेटिव रिसर्च सेंटर' (सीआरसी) व क्विंसलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड हेन्स ने कहा कि, "हमारा मकसद औद्योगिक व नगर पालिका के व्यर्थ पदार्थो से पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद बनाना है।"
"वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया अपने कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थो से 1.3 लाख टन 'फ्लाई एश' व शहरी सीवेज उपचार और पार्को से निकलने वाले हरे अपशिष्ट पदार्थो से लाखों टन 'बायोसॉलिड' बनाता है।"
"वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया अपने कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थो से 1.3 लाख टन 'फ्लाई एश' व शहरी सीवेज उपचार और पार्को से निकलने वाले हरे अपशिष्ट पदार्थो से लाखों टन 'बायोसॉलिड' बनाता है।"
उन्होंने कहा कि, "इन स्रोतों का सृजनात्मक उपयोग कर जमीन की उर्वरता बढ़ाने, मिट्टी में कमियों को दूर करने, जमीन से जहरीले पदार्थो को अवशोषित करने व शहरी इलाकों को खूबसूरत बनाने में मदद मिल सकती है।"
क्विंसलैंड विश्वविद्यालय के एक वक्तव्य में कहा गया है, "पार्को के हरे अपशिष्ट पदार्थो में लकड़ी व छाल को आसानी से विघटित करना संभव नहीं होता है लेकिन इसमें पहले से तैयार विघटनकारी पदार्थ मिलाकर बेहतर खाद तैयार किया जा सकता है।"
क्विंसलैंड विश्वविद्यालय के एक वक्तव्य में कहा गया है, "पार्को के हरे अपशिष्ट पदार्थो में लकड़ी व छाल को आसानी से विघटित करना संभव नहीं होता है लेकिन इसमें पहले से तैयार विघटनकारी पदार्थ मिलाकर बेहतर खाद तैयार किया जा सकता है।"
हेन्स ने कहा कि इन विधियों के उपयोग से समाज की अपशिष्ट पदार्थो की परेशानी को दूर कर उसे उपयोगी संपत्ति में बदला जा सकता है।
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