11 अक्टूबर 2007
वार्ता
नई दिल्ली। देश में शहरी और औद्योगिक क्षेत्र से हर साल करीब 4,000 करोड़ टन ठोस और 500 करोड़ घन मीटर तरल कचरा निकलता है जिनके पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) से अगले तीन वर्षों में करीब 2,500 मेगावॉट बिजली तैयार हो सकती है।
उद्योग एवं वाणिज्य संगठन (एसोचैम) और अर्नस्ट एंड यंग के भारतीय संदर्भ में जलवायु परिवर्तन विषय पर किए गए एक संयुक्त अध्ययन के अनुमानों के मुताबिक अवशिष्ट ऊर्जा परियोजना लगाकर 2010 तक शहरी एवं नगरपालिका क्षेत्र के कचरे से 1,500 मेगावॉट और औद्योगिक कचरे से 1,000 मेगावॉट बिजली तैयार की जा सकती है।
इस परियोजना पर करीब 200 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इस धन को राज्य सरकारों से सब्सिडी और विभिन्न नगर निगमों एवं स्थानीय सरकारों के माध्यम से जुटाया जा सकता है।
एसोचैम की नवीन एवं अक्षय ऊर्जा समिति के अध्यक्ष और वेस्टास आरआरबी के प्रबंध निदेशक राकेश बख्शी ने कहा कि भारत में अगले 30 सालों में अपने अनुमानित उत्सर्जन में एक-चौथाई कटौती करने की क्षमता है। इसमें 25 डॉलर प्रति टन कार्बन समतुल्य से भी कम लागत आएगी।
अर्नस्ट एंड यंग के सहायक निदेशक दीपांकर घोष ने ऊर्जा सृजन, पारेषण और वितरण में कम लागत और खपत वाली तकनीक का इस्तेमाल करके भारत न केवल कार्बन उत्सर्जन बल्कि जलवायु परिवर्तन के असर को भी कम कर सकता है।
भारतीय ऊर्जा क्षेत्र पर किए गए कई शोधों से पता चलता है कि कम बिजली खपत वाली विभिन्न तकनीक और मांग प्रबंधन के बेहतर तरीके अपनाकर देश में लगभग 20 हजार मेगावाट बिजली की बचत की जा सकती है।
इस रिपोर्ट में कोयला, डीजल एवं पेट्रोल जैसे जीवाष्म ईंधन की बजाए प्राकृतिक गैस और जैविक ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी गई है। जैविक ईंधनों के इस्तेमाल से न केवल उत्सर्जन में कमी आएगी वरन ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का जीवन स्तर भी सुधरेगा।
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