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Tuesday, 12 June 2012

अनमोल जैविक खाद

अनमोल जैविक खाद

अनमोल जैविक खाद
वर्मीकम्‍पोस्‍ट (केंचुआ खाद)
मिट्टी की उर्वरता एवं उत्‍पादकता को लंबे समय तक बनाये रखने में पोषक तत्‍वों के संतुलन का विशेष योगदान है, जिसके लिए फसल मृदा तथा पौध पोषक तत्‍वों का संतुलन बनाये रखने में हर प्रकार के जैविक अवयवों जैसे- फसल अवशेष, गोबर की खाद, कम्‍पोस्‍ट, हरी खाद, जीवाणु खाद इत्‍यादि की अनुशंसा की जाती है वर्मी कम्‍पोस्‍ट उत्‍पादन के लिए केंचुओं को विशेष प्रकार के गडढों में तैयार किया जाता है तथा इन केचुओं के माध्‍यम से अनुपयोगी जैविक वानस्पितिक जीवांशो को अल्‍प अवधि में मूल्‍याकन जैविक खाद का निर्माण करके, इसके उपयोग से मृदा के स्‍वास्‍थ्‍य में आशातीत सुधार होता है एवं मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ती है जिससे फसल उत्‍पादन में स्थिरता के साथ गुणात्‍मक सुधार होता है इस प्रकार केंचुओं के माध्‍यम से जो जैविक खाद बनायी जाती है उसे वर्मी कम्‍पोस्‍ट कहते हैं। वर्मी कम्‍पोस्‍ट में नत्रजन फास्‍फोरस एवं पोटाश के अतिरिक्‍त में विभिन्‍न प्रकार सूक्ष्‍म पोषक तत्‍व भी पाये जाते हैं।
वर्मी कम्‍पोस्‍ट के लाभ
(1) जैविक खाद होने के कारण वर्मीकम्‍पोस्‍ट में लाभदायक सूक्ष्‍म जीवाणुओं की क्रियाशीलता अधिक होती है जो भूमि में रहने वाले सूक्ष्‍म जीवों के लिये लाभदायक एवं उत्‍प्रेरक का कार्य करते हैं।
(2) वर्मीकम्‍पोस्‍ट में उपस्थित पौध पोषक तत्‍व पौधों को आसानी से उपलब्‍ध हो जाते हैं।
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(3) वर्मीकम्‍पोस्‍ट के प्रयोग से मृदा की जैविक क्रियाओं में बढ़ोतरी होती है।
(4) वर्मीकम्‍पोस्‍ट के प्रयोग से मृदा में जीवांश पदार्थ (हयूमस) की वृद्धि होती है, जिससे मृदा संरचना, वायु संचार तथा की जल धारण क्षमता बढ़ने के साथ-साथ भूमि उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है।
(5) वर्मीकम्‍पोस्‍ट के माध्‍यम से अपशिष्‍ट पदार्थो या जैव उपघटित कूड़े-कचरे का पुन: चक्रण (Recycling) आसानी से हो जाता है।
(6) वर्मीकम्‍पोस्‍ट जैविक खाद होने के कारण इससे उत्‍पादित गुणात्‍मक कृषि उत्‍पादों का मूल्‍य अधिक मिलता है।
वर्मीकम्‍पोस्‍ट उत्‍पादन के लिए आवश्‍यक अवयव
(1) केंचुओं का चुनाव – एपीजीक या सतह पर निर्वाह करने वाले केंचुए जो प्राय: भूरे लाल रंग के एवं छोटे आकार के होते है, जो कि अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थो को विघटित करते है।
(2) नमी की मात्रा – केंचुओं की अधिक बढवार एवं त्‍वरित प्रजनन के लिए 30 से 35 प्रतिशत नमी होना अति आवश्‍यक है।
(3) वायु – केंचुओं की अच्‍छी बढ़वार के‍ लिए उचित वातायन तथा गड्ढे की गहराई ज्‍यादा नहीं होनी चाहिए।
(4) अंधेरा – केंचुए सामान्‍यत: अंधेरे में रहना पसंद करते हैं अत: केचुओं के गड्ढों के ऊपर बोरी अथवा छप्‍पर युक्‍त छाया या मचान की व्‍यवस्‍था होनी चाहिए।
(5) पोषक पदार्थ – इसके लिए ऊपर बताये गये अपघटित कूड़े-कचरे एवं गोबर की उचित व्‍यवस्‍था होनी चाहिए।
केंचुओं में प्रजनन – उपयुक्‍त तापमान, नमी खाद्य पदार्थ होने पर केंचुए प्राय: 4 सप्‍ताह में वयस्‍क होकर प्रजनन करने लायक बन जाते है। व्‍यस्‍क केंचुआ एक सप्‍ताह में 2-3 कोकून देने लगता है एवं एक कोकून में 3-4 अण्‍डे होते हैं। इस प्राकर एक प्रजनक केंचुए से प्रथम 6 माह में ही लगभग 250 केंचुए पैदा होते है।
वर्मीकम्‍पोस्‍ट के लिए केंचुए की मुख्‍य किस्‍में-
(1) आइसीनिया फोटिडा
(2) यूड्रिलस यूजीनिया
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(3) पेरियोनेक्‍स एक्‍जकेटस
गड्ढ़े का आकार – (40'x3'x1') 120 घन फिट आकार के गढ्ढे से एक वर्ष में लगभग चार टन वर्मीकम्‍पोस्‍ट प्राप्‍त होती है। तेज धूप व लू आदि से केंचुओं को बचाने के लिए दिन में एक- दो बाद छप्‍परों पर पानी का छिड़काव करते रहे ताकि अंदर उचित तापक्रम एवं नमी बनी रहे।
वर्मी कम्‍पोस्‍ट बनाने की विधि- उपरोक्‍त आकार के गड्ढों को ढंकने के‍ लिए 4 -5 फिट ऊंचाई वाले छप्‍पर की व्‍यवस्‍था करें, (जिसके ढंकने के लिए पूआल/ टाट बोरा आदि का प्रयोग किया जाता है) ताकि तेज धूप, वर्षा व लू आदि से बचाव हो सके। गड्ढे में सबसे नीचे ईटो के टुकडो छोटे पत्‍थरों व मिट्टी 1-3 इंच मोटी त‍ह मिछाएं।
गड्ढा भरना – सबसे पहले दो-तीन इंच मोटी मक्‍का, ज्‍वार या गन्‍ना इत्‍यादि के अवशेषों की परत बिछाएं। इसके ऊपर दो- ढाई इंच मोटी आंशिक रूप के पके गोबर की परत बिछाएं एवं इसके ऊपर दो इंच मोटी वर्मी कम्‍पोस्‍ट जिसमें उचित मात्रा कोकुन (केचुए के अण्‍डे) एवं वयस्‍क केंचुए हो, इसके बाद 4-6 इंच मोटी घास की पत्तियां, फसलों के अवशेष एवं गोबर का मिश्रण बिछाएं और सबसे ऊपर गड्ढे को बोरी या टाट आदि से ढक कर रखें। मौसम के अनुसार गड्ढों पर पानी का छिड़काव करते रहें। इस दौरान गड्ढे में उपस्थित केंचुए इन कार्बनिक पदार्थो को खाकर कास्टिंग के रूप में निकालते हुए केंचुएं कड्रढे को ऊपरी सतह पर आने लगते है। इस प्रक्रिया में 3-4 माह का समय लगता है। गड्ढे की ऊपरी सतह का कालो होना वर्मी कम्‍पोस्‍ट के तैयार होने का संकेत देता है। इसी प्रकार दूसरी बार गड्ढा भरने पर कम्‍पोस्‍ट 2-3 महीनों में तैयार होने लगती है।
उपयोग विधि – वर्मी कम्‍पोस्‍ट तैयार होने के बाद इसे खुली जगह पर ढेर बनाकर छाया में सूखने देना चाहिए परन्‍तु इस बात का ध्‍यान रहे कि उसमें नमी बने। इसमें उपस्थित केंचुए नीचे की सतह पर एकत्रित हो जाते है। जिसका प्रयोग मदर कल्‍चर के रूप में दूसरे गड्ढे में डालने के लिए किया जा सकता है। सूखने के पश्‍चात वर्मीकम्‍पोस्‍ट का उपयोग अन्‍य खादों की तरह बुवाई के पहले खेत/वृक्ष के थालों में किया जाना चाहिए। फलदार वृक्ष – बड़े फलदार वृक्षों के लिए पेड़ के थालों में 3-5 किलो वर्मीकम्‍पोस्‍ट मिलाएं एवं गोबर तथा फसल अवशेष इत्‍यादि डालकर उचित नमी की व्‍यवस्‍था करें।
सब्‍जी वाली फसलें- 2-3 टन प्रति एकड़ की दर वर्मीकम्‍पोस्‍ट खेत में डालकर रोपाई या बुवाई करें।
मुख्‍य फसलें – सामान्‍य फसलों के लिए भी 2-3 टन वर्मी कम्‍पोस्‍ट उपयोग बुवाई के पूर्व करें।

सफाई से साफ हो रहा छावनी का कूड़ा

घर से निकलने और नालों में बहने वाला कूड़ा एक निजी संस्था के लिए धनवर्षा कर रहा है। संस्था बिना संसाधन लगाए पहले तो छावनी परिषद से कूड़ा हासिल कर रही है, इसके लिए संस्था को हर माह 4.17 लाख रुपये का भुगतान देने का भी करार हुआ है। करार के दो माह बाद भी कूड़ा निस्तारण कर खाद बनाने की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में है।
छावनी परिषद की चार अक्टूबर की बोर्ड बैठक में निजी संस्था को कूड़े के साथ हर माह 4.17 लाख रुपये देने का प्रस्ताव सदस्यों के विरोध के बीच पारित हुआ था। इससे पहले 30 जुलाई को यह प्रस्ताव बोर्ड बैठक में कड़े विरोध के कारण खारिज हो गया था। दोबारा प्रस्ताव पारित कर सालाना करीब पचास लाख रुपये का भुगतान निजी संस्था को देने का करार हुआ। इतना ही नहीं परिषद ने अपने कर्मचारियों और संसाधनों से ही कूड़ा सुल्तानपुर रोड स्थित टिंचिंग ग्राउंड पर ले जाने का निर्णय लिया। बोर्ड बैठक में बताया गया कि कूड़े के साथ सालाना पचास लाख रुपये के एवज में संस्था टिंचिंग ग्राउंड पर जैविक खाद तैयार करेगी।
कूड़े से तैयार खाद को बेचकर संस्था छावनी परिषद को उसका पचास फीसदी हिस्सा भी देगी। प्रस्ताव पारित होने के साथ ही जैविक खाद से होने वाली आय छावनी परिषद को दिया जाना है। करार होते ही संस्था ने टिंचिंग ग्राउंड के कुछ हिस्सों पर तीन टै्रक्टर ट्राली मिट्टी डालकर दिया।
उसने न तो यहां जैविक और रसायनिक कूड़े को अलग किया और न ही खाद तैयार करने के लिए अपने कर्मचारियों की तैनाती की। प्रतिदिन छावनी के सैन्य व असैन्य इलाकों से चार ट्रक कूड़ा टिंचिंग ग्राउंड पर फेंका जाता है। छावनी परिषद कर्मचारी ही कूड़े में आग लगाकर इसका निस्तारण भी करते हैं।

कूडे से आसक्ति : प्रदूषण से मुक्ति

यह नारा दिया है 'लखनऊ एक्जोरा' की अध्यक्ष श्रीमती प्रभा चतुर्वेदी ने। पेपर मिल कालोनी में उनके घर के सामने स्थित पार्क अपनी आकर्षक हरीतिमा के विस्तार से न केवल सबके मन को लुभाने में सक्षम है बल्कि उनकी निरंतर मेहनत, अनुभव और लगन की कहानी भी व्यक्त करता है। कभी मिट्टी की ऊबड़-खाबड़ जमीन रही यह जगह आज निखर कर हरे-भरे पेड़ों से आच्छादित दूर-दूर तक फैली चमकीली घास और सुन्दर फूलों की लावण्यमयी पंक्तियों से भरी हुई है। इस पार्क को देखकर लगता है कि हर बात में सरकारी आस को ताकते रहने की बजाय स्वयंसेवा से किसी भी जगह का कायाकल्प किया जा सकता है। 'एक्सनोरा लखनऊ' में इस समय साठ सदस्य हैं। उपाध्यक्ष श्रीमती प्रतिभा मित्तल हैं, संरक्षक श्री आर.एन.त्रिपाठी है जो भारतीय प्रशासनिक सेवा के अवकाशप्राप्त अधिकारी हैं। श्री रमाकांत चतुर्वेदी इस संस्था के सचिव हैं।

''ये पार्क भी मेरी तरह उम्रदराज है'' - बड़े विनोदपूर्ण ढंग से बता कर ७१ वर्षीय प्रभा जी ने अपने व्यक्तित्व का पहला पन्ना खोला। वे कहती हैं कि लोगों की लापरवाह हरकतें मेरे मन में घाव करती हैं। जबसे मैंने होश सँभाला, मैं हर चौथे व्यक्ति को सड़क पर चलते-चलते टोक देती थी। आज इसी वजह से मैं पेपर मिल कालोनी को दे पाई हूँ, यह सुन्दर पार्क और ये साफ सुथरी सड़कें और नालियाँ। 

वारालिका दुबे- कैसे होता है इस पार्क का रखरखाव? 
प्रभा चतुर्वेदी- हम मुहल्ले वालों ने आपस में पैसे जोड़कर तीन माली रखे हैं। इस मुहल्ले में सब लोग सब्जी का छिलका आदि जो जैविक पदार्थ हैं और आसानी से कम्पोस्ट खाद में परिवर्तित किए जा सकते हैं, अलग से इस पार्क में बने गड्ढों में डालते हैं। इस कूड़े और पार्क की झड़ चुकी पत्तियों को, जलाया नहीं जाता बल्कि, गड्ढों में खाद बनाने के लिए डाला जाता है। इस प्रकार तैयार कम्पोस्ट खाद से इस पार्क के पौधों को पोषण मिलता है।

वारालिका दुबे- इसका मतलब है कि घरों में लोग कूड़े में से जैविक पदार्थ जैसे सब्जियों के छिलके इत्यादि एवं विषैले पदार्थ जैसे पॉलीथीन इत्यादि को एक दूसरे से अलग कर लेते हैं। 
प्रभा चतुर्वेदी- हाँ, और यह बहुत आसान है रसोई में हिण्डालियम या स्टील का बड़ा डिब्बा रखें। उसी में नीचे पत्तियाँ बिछा लें। एक-दो दिन जैविक कूड़ा डालते रहें फिर उसे मुहल्ले में जिसके यहाँ लॉन हो उसके यहाँ या फिर पार्क में बने गढ्ढे में डलवा दें। बाकी विषैला कूड़ा, कागज इत्यादि अलग कूड़ेदान में डालें। 

वारालिका दुबे- आपने बडी ही सरलता से यह भी बता दिया कि रसोई में कचरे के डिब्बे के प्रयोग की विधि क्या होनी चाहिए। लेकिन जहाँ मुहल्ले नहीं हैं और बहुमंज़िले भवन हैं वहाँ यह कूड़ा कहाँ डाला जाए? 
प्रभा चतुर्वेदी- बहुमंज़िले भवनों के परिसर में स्थित मैदान के एक कोने में भी डाला जा सकता है। आधुनिक मुहल्ले ही तो हैं यह बहुमंज़िले भवन। फिर इस कूडे को बेच कर, चाहे कम ही सही, धन भी कमाया जा सकता है। हमारे पार्क में हर तीन महीने में लगभग चार क्विंटल कम्पोस्ट खाद बन जाती है, जिसे हम पंद्रह रूपये किलो बेच भी देते हैं। 

वारालिका दुबे- क्या आपके मुहल्ले का यह प्रयोग लखनऊ नगर निगम सभी पार्कों में नही कर सकता? 
प्रभा चतुर्वेदी- मैं आपको बताऊँ कि प्रशासन में भी बहुत से संवेदनशील अधिकारी नगर-निगम एवं लखनऊ विकास प्राधिकरण इत्यादि में आए। इनमें से श्री शैलजाकान्त मिश्रा, श्री एस.पी. सिंह ऐसे कितने ही लोग हैं। २००४ में वर्षा जल संचयन के तरीकों पर भी लखनऊ विकास प्राधिकरण ने गृहणियों, वास्तुशास्त्रविदों इत्यादि के लिए कई कार्यक्रम किए जिनमें मुझे आमन्त्रित किया गया था। किन्तु पार्कों में यह सब करने के लिए प्रशासनिक पहल की बजाय पार्क के चारों ओर रहने वालों की इच्छाशक्ति की अधिक आवश्यकता होती है। 

वारालिका दुबे- पर फिर भी सरकारी तन्त्र की सहायता तो चाहिए ही? 
प्रभा चतुर्वेदी- एक सीमा तक यह बात सही है लेकिन स्वयं पहल करने पर सहायता भी मिलने लगती है। मेरे काम के बारे में जानकर एक्सनोरा इंटरनेशनल ने मुझे लखनऊ में एक्सनोरा इन्नोवेटरी क्लब का अध्यक्ष बनाया और काम ने गति पकड़ ली। 

वारालिका दुबे- एक्सनोरा इंटरनेशनल क्या है - 
प्रभा चतुर्वेदी- एक्सनोरा चेन्नई में कार्यरत एक स्वयंसेवी संस्था है, लखनऊ एक्सनोरा का जन्म १९९६ में हुआ जब एक्सनोरा इंटरनेशनल के संस्थापक श्री एम.बी. निर्मल लखनऊ आए। इनकी प्रेरणा से ही इस संस्था की नींव पड़ी और ६ अगस्त १९९७ को इसे पंजीकृत कर दिया गया। संस्था का मानना है कि घर के आगे पेड़ लगाने, घर में प्रयोग किए जा रहे पानी को सिंचाई के लिए उपयोगी बनाने, वर्षा का जल का संचय करने, कूड़े का सही प्रबन्धन करने और घरों में सब्जी आदि उगाने के लिए छोटा सा बग़ीचा बनाने मात्र से ही हम अपने देश को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का देश बना सकते हैं। इस संस्था में उत्तम, नये और मूलभूत विचारों को प्रोत्साहन दिया जाता है

वारालिका दुबे- यदि कोई निजी व्यवसायी जैसे जिन्दल पावर, रिलायन्स वगैरह इस काम में आगे बढें तो क्या यह संभव है? 
प्रभा चतुर्वेदी- क्यों नही? इस तरह से निजी व्यवसायी, अवकाश प्राप्त बुर्जुगों को एक अच्छे काम में व्यस्त भी कर सकते है। पर मेरा मतलब यह नही है कि बच्चे या नवयुवक इस कार्य को नहीं कर सकते। नवयुवकों को भी कूडा-प्रबंधक बनाया जा सकता है। सच पूछिए तो मुझे कूड़े से एक आसक्ति सी है। मेरा बस चले तो मैं लोगों को समझाऊँ कि कूड़े का सही प्रबन्धन करके वातावरण को स्वस्थ बनाना किसी पूजा से कम नहीं। 

वारालिका दुबे- कूड़े का प्रबन्धन एक आम आदमी को कैसे करना चाहिए? 
प्रभा चतुर्वेदी- बड़ा ही आसान है दिन के चौबीस घंटों में से यदि कोई मात्र एक या दो मिनट भी दे सके तो कूड़ा प्रबंधन बहुत आसान हो सकता है। कूड़ा बनाते समय ही जैविक कूड़े यानी सब्जी के छिलके आदि को अलग से संचय करें। ध्यान देना चाहिए कि हम कूड़े को नष्ट कर के उससे बन सकने वाली जैविक कम्पोस्ट खाद को खो रहे हैं और अपना ही नुकसान कर रहे हैं। यदि जैविक खाद प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो तो यूरिया इत्यादि रासायनिक खादों से आसानी से बचा जा सकता है। 

एक्सनोरा लखनऊ निम्नलिखित दिशाओं में जन चेतना जागरण के प्रयास में कार्यरत है-

  • अपने घर की स्वच्छता जितनी आवश्यक है घर के बाहर की भी उतनी ही आवश्यक है क्योंकि गंदगी समस्त पर्यावरण को प्रदूषित करती है।

  • घरों से निकलने वाला हर अपशिष्ट उपयोगी है बशर्ते उसका सही उपयोग किया जाए। घर के कचरे को दो भागों में बाँटना चाहिए पहला हरा या रसोई का कचरा जिसमें सब्जियों के छिक्कल, चाय की पत्ती आदि होते हैं और सूखाकचरा जिसमें कागज, प्लास्टिक और धातु आदि होते हैं। हरे या रसोई के कचरे को किसी गड्ढे में दबा कर खाद बनाई जा सकती है। सूखे कचरे को कबाड़ी को दे देना चाहिए।

  • किसी भी कीमत पर नदी के जल में किसी प्रकार का कचरा न डालें चाहे वह हवन की सामग्री या पूजा के फूल ही क्यों न हों। इन्हें भी ज़मीन में दबाना चाहिए।

  • जल की आपूर्ति में होती उत्तरोत्तर कमी को दृष्टिगत रखते हुए जल संरक्षण के सभी उपाय अपनाएँ पानी व्यर्थ न गँवाएँ।

सहयोग- रमाकांत चतुर्वेदी
 

५ अप्रैल २०१०

सुंदर शहर के सपने को गंदगी का ग्रहण

गतिरोध 2012

-नियमित सफाई के नाम पर महज खानापूर्ति

-शहर में कूड़ा फेंकने के लिए जमीन उपलब्ध नहीं

-नगर निगम के साथ शहरवासी भी जिम्मेदार

आलोक कुमार मिश्रा, भागलपुर, नगर संवाददाता

स्वच्छ व सुंदर शहर के सपने को गंदगी का ग्रहण लग गया है। इसके लिए अकेले नगर निगम नहीं बल्कि शहरवासी भी जिम्मेदार हैं। एक तरफ जहां नगर निगम शहरी सुविधाएं बहाल करने में अक्षम साबित हो रहा है, वहीं आम-आवाम जहां-तहां गंदगी का ढेर जमा कर शहर की सुरत पर कालिख पोतने का काम रहे हैं।

निर्धारित जगह के अभाव में कूड़े का सही ढंग से उठाव नहीं होना भी एक कारण है। ऐसी स्थिति में शहर के कई इलाके उचित सफाई से महरूम हैं। यद्यपि,कुछ इलाकों में नियमित सफाई जरूर होती है, लेकिन अधिकांश जगहों पर सफाई के नाम महज खानापूर्ति ही होती है। यही वजह है कि शहर में गंदगी फैली हुई। वहीं नाला जाम होने से उसका पानी सड़कों पर बहने लगता है, जिसके बदबू से शहरवासी परेशान हैं।

कूड़ा फेंकने का निर्धारित स्थान नहीं : प्रशासन की ओर जमीन आवंटित नहीं कराने से नगर निगम के सामने कूड़ा फेंकने की समस्या बनी है। ढाई साल पूर्व शहर का कूड़ा दाउदबाट में गिराया जाता था। लेकिन अब उस जमीन पर जिला प्रशासन द्वारा महादलितों को बसा दिया गया है। नतीजतन, निर्धारित जमीन के अभाव में जहां-जहां कूड़े फेंके जा रहे हैं। लोगों की मांग के अनुसार गढ्डे में कूड़े गिराए जा रहे हैं।

नाथनगर दिग्घी में जमीन मिलने की संभावना : कूड़ा फेंकने के लिए अब नाथनगर प्रखंड के दिग्घी मौजा में गैर उपजाऊ जमीन को चिह्नित किया गया है। जिला प्रशासन की ओर से यहां 22.59 एकड़ जमीन निगम को स्थानांतरित करने की दिशा में कार्रवाई की जा रही है। उक्त जमीन के लिए नगर निगम द्वारा एक करोड़ 19 लाख 72 हजार 700 रुपये की मूल्य निर्धारित की गई है। दो माह पूर्व नगर निगम द्वारा नगर विकास एवं आवास विभाग को विधिवत जानकारी भी दी गई है।

कूड़े से होगा जैविक खाद व विद्युत का उत्पादन : आवंटन के बाद कूड़े के ढेर से जैविक खाद व विद्युत का उत्पादन होगा। कूड़े को जलाए बिना विद्युत उत्पादन करने के लिए रोकेन सप्रेशन सिस्टम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, मुंबई उपकेंद्र बनाकर विद्युत उत्पादन के लिए नगर निगम द्वारा सहमति दी गई है। इस योजना के लिए कंपनी यहां तीन एकड़ जमीन खरीदेगी। कूड़े से तैयार जैविक खाद या फिर बिजली उत्पादन से निगम को राजस्व का लाभ नहीं होगा।

संसाधन भी हैं : कूड़े उठाने व शहर की सफाई व्यवस्था के लिए नगर निगम के पास दो माध्यम हैं। शहर में नगर निगम की कर्मियों और ठेका कंपनी रैमकी द्वारा शहर की सफाई कराई जाती है। निगम के पास नौ ट्रैक्टर, 12 ट्रेलर, एक्वेटर पेल आडर, 80 हाथ ठेला, 12 व्हील बेरी, एक जेवीसी तथा 243 नियमित व 200 अस्थाई कर्मी हैं। वहीं रैमकी के पास 14 ऑटो टीयर, 7 डीपी व्हील, एक डंफर, एक जेवीसी, 22 ट्राय साइकिल, 10 पूस कार्ड, एक स्वीपिंग मशीन, 6 ट्रैक्टर हैं।

कई जगहों पर नहीं है डस्टबीन

सिकंदरपुर, लहेरीटोला, कमलनगर कॉलोनी, शहीद चौक, मुख्य डाकघर सहित शहर के कई इलाकों में डस्टबीन की व्यवस्था नहीं है। पूरे शहर में करीब 80 डस्टबीन चार-पांच साल पूर्व बनाए गए थे। इनमें अधिकांश जर्जर या टूट चुके हैं। रैमकी द्वारा सड़क किनारे रखे गए डस्टबीन का भी उचित इस्तेमाल नहीं हो रहा है। एक से सवा किलोमीटर की दूरी पर एक डस्टबीन होने से लोग घर या सड़क व नाले में ही कूड़े फेंके देते हैं। उचित सफाई के अभाव में सड़कों पर कूड़े का ढेर जमा हो जाता है, फिर नाला जाम की समस्या भी खड़ी हो जाती है। मानिक सरकार, लहेरीटोला, सिकंदरपुर, बूढ़ानाथ रोड से खलीफाबाग जाने वाली सड़क, कमलनगर कॉलोनी, कचहरी परिसर आदि जगहों में कूड़े का ढेर है।

प्रतिदिन 150-160 टन कूड़े की सफाई : नगर निगम व ठेका कंपनी रैमकी द्वारा प्रतिदिन 150 से 160 टन कूड़े की सफाई की जाती है। इनमें रैमकी द्वारा करीब 110 टन कूड़े की सफाई की जाती है। इस हिसाब से प्रतिमाह करीब पांच हजार व एक साल में 60 हजार टन कूड़े की सफाई होती है।

90 लाख रुपये होते हैं खर्च :

सफाई व्यवस्था में एक महीने में करीब 90 लाख रुपये नगर निगम खर्च करता है। इस हिसाब से सलाना 10 करोड़ 80 लाख रुपये खर्च होते हैं।

कोई नाखुश तो कोई संतुष्ट : सफाई व्यवस्था से कोई नाखुश हैं तो कोई संतुष्ट भी हैं। वार्ड संख्या 29 के बरारी निवासी कोको दुबे व ललन ठाकुर, वार्ड संख्या 16 के विक्रमशिला कॉलोनी निवासी अधिवक्ता संजय कुमार सिंह व वार्ड संख्या 31 के सचिदानंदगनर कॉलोनी निवासी नारायण शर्मा ने सफाई व्यवस्था पर संतुष्टि जाहिर की है। वहीं वार्ड संख्या 46 के सिकंदरपुर निवासी अधिवक्ता संजय कुमार मोदी, वार्ड संख्या 17 के बूढ़ानाथ मोहल्ला निवासी रामनाथ गुप्ता व वार्ड संख्या 50 के कमलनगर कॉलोनी निवासी राजेंद्र कुमार दर्वे का कहना है कि इन जगहों में वर्षो से सफाई नहीं हुई है।

नियमित सफाई की खानापूर्ति : गत वर्ष गतिरोध अभियान के तहत दैनिक जागरण ने शहर की सफाई व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण समस्याओं की बात उठाई थी। उसके बाद संबंधित अधिकारी को ज्ञापन दिया था। नतीजा यह निकला कि नियमित सफाई के नाम पर सालभर खानापूर्ति की गई। दो चार बार नाले की सफाई की गई, लेकिन उचित सफाई नहीं होने से अधिकांश नाले जाम हैं।

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कोट :-

'छोटे-बड़े नालों की सफाई की जाती है। लोग घर का कूड़ा सड़क व नाले में फेंका देते हैं। इस कारण नाला जाम होता है। मकान का मलबा तक लोग सड़क व नाला में डाल देते हैं। इस कारण जहां-तहां कूड़ा जमा हो जाता है।'

महेश प्रसाद, स्वास्थ्य प्रभारी, नगर निगम

कचरा भी बन सकता है उपयोगी

06 अक्‍टूबर 2009 
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

सिडनी।
 एक नए अध्ययन के मुताबिक बिजली संयंत्रों, खनिज प्रसंस्करण संयंत्रों और नगर पालिकाओं से उत्सर्जित लाखों टन व्यर्थ पदार्थो के उपयोग से उर्वरता, स्वास्थ्य, धन और खूबसूरती को पैदा किया जा सकता है।

'कोऑपरेटिव रिसर्च सेंटर' (सीआरसी) व क्विंसलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचर्ड हेन्स ने कहा कि, "हमारा मकसद औद्योगिक व नगर पालिका के व्यर्थ पदार्थो से पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद बनाना है।" 

"वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया अपने कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थो से 1.3 लाख टन 'फ्लाई एश' व शहरी सीवेज उपचार और पार्को से निकलने वाले हरे अपशिष्ट पदार्थो से लाखों टन 'बायोसॉलिड' बनाता है।"

उन्होंने कहा कि, "इन स्रोतों का सृजनात्मक उपयोग कर जमीन की उर्वरता बढ़ाने, मिट्टी में कमियों को दूर करने, जमीन से जहरीले पदार्थो को अवशोषित करने व शहरी इलाकों को खूबसूरत बनाने में मदद मिल सकती है।"

क्विंसलैंड विश्वविद्यालय के एक वक्तव्य में कहा गया है, "पार्को के हरे अपशिष्ट पदार्थो में लकड़ी व छाल को आसानी से विघटित करना संभव नहीं होता है लेकिन इसमें पहले से तैयार विघटनकारी पदार्थ मिलाकर बेहतर खाद तैयार किया जा सकता है।"


हेन्स ने कहा कि इन विधियों के उपयोग से समाज की अपशिष्ट पदार्थो की परेशानी को दूर कर उसे उपयोगी संपत्ति में बदला जा सकता है।

तिहाड़ जेल में कूड़े से बनेगी बिजली

21 नवंबर 2009
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस

नई दिल्ली।
 देश के सबसे बड़े कारागार तिहाड़ जेल में जमा हो रहे कचरे से बिजली बनाई जाएगी। इसके लिए जेल परिसर में 'बायोटेक प्लांट' स्थापित करने का प्रस्ताव जेल प्रशासन को मिला है। यदि इस प्रस्ताव को जेल प्रशासन की हरी झंडी मिल गई, तो इस प्रस्ताव को कुछ महीनों के भीतर ही अमली जामा पहना दिया जाएगा। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने जेल प्रशासन के पास इस संदर्भ में एक प्रस्ताव भेजा है।

तिहाड़ जेल के प्रवक्ता सुनील गुप्ता ने आईएएनएस को बताया कि, "नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें जेल के अंदर ही कूड़े और लकड़ी के बुरादे से बिजली बनाने का प्रस्ताव जेल प्रशासन के सामने रखा गया है। इसके लिए जेल परिसर के अंदर बायोटेक प्लांट स्थापित करने का प्रस्ताव है।" 

तिहाड़ जेल की बैरकों में लग रहे कचरे के ढेर को और जेल फैक्ट्री से निकलनेवाले कचरे को संज्ञान में लेते हुए नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने जेल प्रशासन के पास प्रस्ताव भेजा है, जिसमें जेल के अंदर ही बायोटेक प्लांट बनाकर कूड़े-कचरे और लकड़ी के बुरादे का उपयोग बिजली बनाने में किया जाएगा।

प्रवक्ता का कहना है कि नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के इस प्रस्ताव को जेल प्रशासन की हरी झंडी का इंतजार है, जिसके बाद जेल परिसर में यह बायोटेक प्लांट स्थापित किया जाएगा। प्रवक्ता का कहना है कि इस प्लांट के स्थापित हो जाने के बाद जेल प्रशासन अपने ही द्वारा उत्पादित बिजली का उपयोग कर सकेगा। आवश्यकता से अधिक बिजली उत्पन्न होने पर जेल प्रशासन इसे बेचकर कमाई भी कर सकेगा। इस बायोटेक प्लांट के स्थापित होने के बाद जेल प्रशासन के सामने गैस की बचत होने की भी संभावना है।

उल्लेखनीय है कि जेल में बिजली की खपत को देखते हुए जेल प्रशासन की तरफ से 'अर्थ आवर' मनाया जा रहा है। इसके तहत जेल में सुबह और शाम दो-दो घंटे बिजली की कटौती की जा रही है। 

कचरे से बन सकती है 2,500 मेगावॉट बिजली

11 अक्टूबर 2007
वार्ता

नई दिल्ली। 
देश में शहरी और औद्योगिक क्षेत्र से हर साल करीब 4,000 करोड़ टन ठोस और 500 करोड़ घन मीटर तरल कचरा निकलता है जिनके पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) से अगले तीन वर्षों में करीब 2,500 मेगावॉट बिजली तैयार हो सकती है।

उद्योग एवं वाणिज्य संगठन (एसोचैम) और अर्नस्ट एंड यंग के भारतीय संदर्भ में जलवायु परिवर्तन विषय पर किए गए एक संयुक्त अध्ययन के अनुमानों के मुताबिक अवशिष्ट ऊर्जा परियोजना लगाकर 2010 तक शहरी एवं नगरपालिका क्षेत्र के कचरे से 1,500 मेगावॉट और औद्योगिक कचरे से 1,000 मेगावॉट बिजली तैयार की जा सकती है।

इस परियोजना पर करीब 200 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इस धन को राज्य सरकारों से सब्सिडी और विभिन्न नगर निगमों एवं स्थानीय सरकारों के माध्यम से जुटाया जा सकता है।

एसोचैम की नवीन एवं अक्षय ऊर्जा समिति के अध्यक्ष और वेस्टास आरआरबी के प्रबंध निदेशक राकेश बख्शी ने कहा कि भारत में अगले 30 सालों में अपने अनुमानित उत्सर्जन में एक-चौथाई कटौती करने की क्षमता है। इसमें 25 डॉलर प्रति टन कार्बन समतुल्य से भी कम लागत आएगी।

अर्नस्ट एंड यंग के सहायक निदेशक दीपांकर घोष ने ऊर्जा सृजन, पारेषण और वितरण में कम लागत और खपत वाली तकनीक का इस्तेमाल करके भारत न केवल कार्बन उत्सर्जन बल्कि जलवायु परिवर्तन के असर को भी कम कर सकता है।

भारतीय ऊर्जा क्षेत्र पर किए गए कई शोधों से पता चलता है कि कम बिजली खपत वाली विभिन्न तकनीक और मांग प्रबंधन के बेहतर तरीके अपनाकर देश में लगभग 20 हजार मेगावाट बिजली की बचत की जा सकती है।

इस रिपोर्ट में कोयला, डीजल एवं पेट्रोल जैसे जीवाष्म ईंधन की बजाए प्राकृतिक गैस और जैविक ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाने की सलाह दी गई है। जैविक ईंधनों के इस्तेमाल से न केवल उत्सर्जन में कमी आएगी वरन ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का जीवन स्तर भी सुधरेगा।

अब कचरे से बनेगी सीमेन्ट |

21 अप्रैल 2008
आवाज समाचार 

हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश)।
 सीमेन्ट कम्पनियां अपनी लागत कम करने के लिए अब कोयले की जगह कचरे का इस्तेमाल करेंगी।

इन कम्पनियों का मानना है कि कचरे के इस्तेमाल से सीमेन्ट की लागत में कमी आने के साथ-साथ प्रदूषण की मात्रा भी कम हो जाएगी।

कचरे के इस्तेमाल करने से शुरु में सीमेन्ट बनाने की लागत में पांच फीसदी की कमी आएगी जो बाद में बढ़कर बीस फीसदी तक हो सकती है।

हिमाचल में बनी प्लास्टिक कचरे से पक्की सड़क |


शिमला।
 हिमाचल प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री ठाकुर गुलाब सिंह ने शुक्रवार को प्लास्टिक कचरे से पक्की की गई टूटू से जुब्बड़-हट्टी के मध्य एक किलोमीटर सड़क का निरीक्षण किया तथा इसके निर्माण पर संतुष्टि व्यक्त की। उत्तर भारत में इस तरह का यह पहला प्रयोग है।

उन्होंने कहा कि राज्य के प्रत्येक लोक निर्माण वृत्त को 'मिक्सिंग शैडर' प्रदान किया जाएगा ताकि सड़क पक्का करने के कार्य में प्लास्टिक कचरे का समुचित प्रयोग किया जा सके।

उन्होंने कहा कि इस पूरी सड़क को प्लास्टिक कचरे से पक्का किया जाएगा। इससे न केवल 15 प्रतिशत तारकोल बचाया जा सकेगा, बल्कि पर्यावरण के संरक्षण में भी इस तरह की कार्यप्रणाली सहायक सिद्घ होगी।

उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश उत्तर भारत का ऐसा प्रथम राज्य है, जो प्लास्टिक व उससे मिलते-जुलते कचरे से सड़कों को पक्का कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस विधि से प्रति किलोमीटर लगभग दो लाख रुपए की बचत होगी।

कूड़े से तैयार होगी जैविक खाद |

प्रतापगढ़। उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ नगरपालिका ने अब कूड़े से खाद बनाने का निर्णय किया है, जिससे हर साल करीब बीस लाख रुपए की आमदनी होगी।

नगरपालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी टी. एन. तिवारी ने आज यहां कहा कि शहर से सटे टेंडगा गांव में 13 एकड़ जमीन 25 साल के लिए अनुबंध पर ली गई है, जिसमें शहर से निकलनेवाले कूड़े को जमा कर वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाई जाएगी। इसके लिए प्रतिदिन लगभग 15 टन कूड़ा जमा किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि इससे जहां नगरवासियों को गंदगी से निजात मिलेगी, वहीं जैविक खाद की बिक्री से नगरपालिका को हर साल बीस लाख रुपए का मुनाफा होगा। उन्होंने कहा कि पुनर्चक्रणीय कूड़े से खाद और अपुनर्चक्रणीय कूड़े को जमीन के समतलीकरण में उपयोग कर पेड़ पौधे लगाए जाएंगे।